- सूत्रों के मुताबिक, छात्र संगठनों के बीच एक नवंबर तक विरोध जारी रखने को लेकर चर्चा है। यदि यह रणनीति आगे बढ़ती है तो आने वाले दिनों में छोटे प्रदर्शन, प्रतीकात्मक विरोध, छात्र संगठनों की लामबंदी और विपक्षी नेताओं के कार्यक्रम आंदोलन के प्रमुख हिस्से हो सकते हैं। हालांकि, इसे अभी संगठनों की घोषित और अंतिम रणनीति नहीं माना जा सकता।
- विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची में बदलाव और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहा है। एक नवंबर की रैली इन मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में फिर से प्रमुखता देने का अवसर बन सकती है।
आगे की रणनीति में तीन सवाल अहम
- पहला, क्या आंदोलन का केंद्र तिरंगा और नागरिक अधिकार बनेंगे? शुक्रवार के कार्यक्रम से संकेत मिलता है कि प्रदर्शनकारी अब ऐसे प्रतीकात्मक तरीकों को भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनके जरिए वे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सवाल उठा सकें।
- दूसरा, क्या छात्र संगठन हिरासतों के बावजूद आंदोलन जारी रखेंगे? नेहा बोरा की हिरासत और छात्र संगठनों की सक्रियता के बाद यह देखना अहम होगा कि प्रदर्शन कितना जारी रह सकता है।
- तीसरा, क्या विपक्षी दल एक साझा कार्यक्रम पर टिक पाएंगे? एक नवंबर की रैली की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि कांग्रेस समेत INDIA गठबंधन के घटक दल, छात्र संगठन और नागरिक समूह साझा मुद्दों पर कितनी एकजुटता दिखाते हैं। हालांकि राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं चुनाव आयोग के मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शन एक ही हैं।

