भारत के पास क्या विकल्प हैं और क्या हो सकता है अगला कदम?
अदालत के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह खारिज किया- भारत शुरुआत से ही द हेग स्थित मध्यस्थता अदालतकी कार्यवाही और उसकी वैधता का बहिष्कार करता रहा है। भारत का रुख रहा है कि निष्पक्ष विशेषज्ञ की प्रक्रिया ही सही मंच है। भारत इस फैसले को 'गैर-कानूनी' या 'बिना अधिकार क्षेत्र वाला' घोषित कर इसे मानने से इनकार कर चुका है। भारत आगे भी अपने इसी कदम पर कायम रहेगा।संधि में संशोधन की मांग पर कायम रहना- भारत ने जब अप्रैल 2025 में संधि को 'स्थगित' किया था तो उसका मुख्य उद्देश्य 1960 के नियमों में संशोधन करना था। भारत पाकिस्तान को अल्टीमेटम दे सकता है कि यदि पाकिस्तान संधि में बदलाव जैसे- आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन के नए सुरक्षा मापदंड पर चर्चा नहीं करता, तो भारत परियोजना के निर्माण कार्य जारी रखेगा।
जमीनी स्तर पर परियोजनाओं पर तेजी से काम- कूटनीतिक इनकार के साथ-साथ भारत रतले और किशनगंगा जैसी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में तेजी ला सकता है। भारत का यह मानना है कि उसकी परियोजनाएं संधि के तकनीकी ढांचे के भीतर ही हैं।

