क्या UP में बीजेपी के लिए मुसीबत बन सकते हैं 'कॉकरोच'?
Updated on
18-10-2026 11:34 AM
लेखक: स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं। राजनीति के लिहाज से यह एक बहुत लंबा समय होता है। लेकिन दिल्ली में ' कॉकरोच जनता पार्टी ' (CJP) का चल रहा आंदोलन और उस पर प्रशासन की लगभग घबराहट भरी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि योगी के सामने आगे चुनौतियां आने वाली हैं।
10 अक्टूबर को पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने राजधानी के कुछ हिस्सों को बंद कर दिया। मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया। मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया और 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। उद्देश्य? युवाओं को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने से रोकना। 16 अक्टूबर को पुलिस ने सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके और छात्र नेताओं को हिरासत में ले लिया। कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क को बंद कर दिया और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े विरोध को रोकने के लिए सुरक्षा बलों को तैनात किया। फिर भी सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन किया।
गुस्से का प्रतिनिधित्व
सरकार विरोध-प्रदर्शनों को और अधिक फैलने से रोकने के लिए उत्सुक दिखती है, लेकिन कुछ आंदोलन तो सख्ती किए जाने पर और भी मजबूत हो जाते हैं। पुलिस सड़कों पर तो नियंत्रण पा सकती है, लेकिन राजनीतिक संदेश को इतनी आसानी से नियंत्रित नहीं कर सकती। सीजेपी अब लीक हुए नीट परीक्षा पत्रों के खिलाफ एक मुद्दे वाला आंदोलन नहीं रह गया है। यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर व्यापक गुस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इसने चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की आलोचना की है।
ड्राफ्ट रोल से हटे नाम
देश भर में लगभग 130 मिलियन नाम ड्राफ्ट रोल से हटा दिए गए, जो अधिकांश देशों की जनसंख्या से भी अधिक है। आयोग ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा है कि इनमें मृत, स्थानांतरित और लापता मतदाता शामिल हैं। गलत तरीके से हटाए गए मतदाता बहाली की मांग कर सकते हैं। लेकिन कई आलोचक अल्पसंख्यकों को असंगत तरीके से हटाने का आरोप लगाते हैं।
सुलझा लिए मतभेद
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां सहित कई लोगों ने कहा है कि कोई भी प्रक्रिया जो लाखों भारतीय नागरिकों को अधिकार से वंचित करती है, वह आंतरिक रूप से मनमाना और संवैधानिक आदेश का 'अस्वीकार' है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक दो चुनाव आयुक्तों ने मतदाता-सूची में बदलाव और डिजिटल प्रक्रियाओं के केंद्रीकरण पर गंभीर आंतरिक आपत्तियां उठाई थीं। आयोग का कहना है कि सभी मतभेदों को सुलझा लिया गया और निर्णय सर्वसम्मति से हुए।
मुद्दा बड़ा न बन जाए
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मतदाता सूची में हेराफेरी की गई थी। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने चुनावी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बुनियादी सवाल उठाए हैं। परीक्षा घोटालों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को अधिकारियों को सजा देकर या किसी मंत्री को बदलकर शांत किया जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र के लिए खतरा महसूस होने पर शुरू हुए आंदोलन को शांत करना ज्यादा मुश्किल होता है। बीजेपी के सामने अब सबसे बड़ा खतरा यह है कि लोगों की अलग-अलग शिकायतें मिलकर एक बड़ा और गंभीर मुद्दा न बन जाएं।
ये अच्छा संकेत नहीं
पार्टी का लंबे समय से यह मानना था कि युवा भारतीय, मोदी के बहुत पक्के समर्थक हैं। इन्हीं युवाओं में से कुछ अब प्रदर्शनकारी बन गए हैं। ये कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के ऐसे कार्यकर्ता नहीं हैं, जो राजनीतिक निर्देशों का पालन कर रहे हों। CJP के नेता स्पष्ट रूप से एक अतिरिक्त ताकत हैं। यह आने वाले UP चुनावों में पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हो सकते हैं। 2024 के आम चुनावों में, UP में BJP की सीटें 2019 की 62 से घटकर 33 रह गईं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं। BJP का वोट शेयर भी गिरकर लगभग 41% रह गया। इसका सबसे बड़ा कारण विपक्ष का एकजुट होना था।
बीजेपी की फिर वापसी
योगी इस नतीजे को एक अपवाद मान सकते हैं, जो अति-आत्मविश्वास और मतदान केंद्र स्तर पर पर्याप्त ध्यान न देने की वजह से हुआ था। बाद में, जब बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने 10 उपचुनावों में से आठ में जीत हासिल की, तो उन्होंने इसे अपनी सही रणनीति की पुष्टि के रूप में पेश किया। उत्साहजनक बात यह रही कि इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने शानदार वापसी की। 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, जहां कुल 1,686 विधानसभा सीटें हैं। बीजेपी 2024 के संसदीय चुनावों के दौरान 497 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी, और बाद में हुए विधानसभा चुनावों में उसने 664 सीटें जीतीं। हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में पार्टी को बड़ी जीत मिली।
सीधे कैश मददगार
2024 की गलतियों से सीखते हुए, BJP ने बूथ स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की, जातिगत समीकरणों को ठीक किया, विपक्ष की कमजोरियों का फायदा उठाया और महिलाओं को खास तौर पर लुभावने कल्याणकारी लाभ दिए। महिलाओं को सीधे नकद राशि देना चुनाव जीतने में मददगार साबित हुआ है, और योगी भी इसे आजमाना चाहेंगे। दूसरी ओर, UP के सभी दस उपचुनाव CJP (जाति-आधारित राजनीति) के उभार से पहले हुए थे, जिसने शायद मतदाताओं की निष्ठा बदल दी हो।
खतरे की बजी घंटी
2024 के 80 लोकसभा चुनाव परिणामों को 403 विधानसभा क्षेत्रों में बांटकर देखें, तो सपा के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन को 224 सीटों पर, NDA को 174 सीटों पर और अन्य को 5 सीटों पर बढ़त मिली थी। अगर 2027 में मतदाता इसी पैटर्न को दोहराते हैं, तो INDIA गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा, जबकि BJP के नेतृत्व वाला NDA काफी पीछे रह जाएगा। तीन स्थितियों पर विचार करें। पहली, योगी अन्य राज्यों की तरह स्थिति सुधारने में कामयाब हो जाते हैं और चुनाव जीत जाते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार निश्चित रूप से योगी की मदद करेगी, ताकि वे महिला मतदाताओं को बड़े पैमाने पर लाभ दे सकें।
बेहतर प्रदर्शन क्यों?
दूसरे परिदृश्य में 2024 के चुनाव के बाद के फायदे और नुकसान लगभग रद्द हो जाते हैं, जिससे 2024 जैसा ही परिणाम मिलता है। लोकप्रिय वोट में मामूली सुधार के बावजूद 2024 में विपक्ष के इतना बेहतर प्रदर्शन करने का एक कारण यह था कि सपा और कांग्रेस ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा था। वे दोबारा ऐसा करेंगे, जिससे जीत की उम्मीद जगेगी। हालांकि, जीत का अंतर बड़ा नहीं हो सकता है, और बीजेपी चुनावी असफलताओं के बाद भी दलबदलुओं के समर्थन से सरकार बनाने में माहिर साबित हुई है।
चिंता करने का मौका
तीसरा परिदृश्य ताजा भाजपा विरोधी भावना का है, जो इंडिया गुट को मजबूत कर रहा है और भाजपा को परास्त कर रहा है। हमारी चुनावी प्रणाली में लोकप्रिय वोट के केवल एक छोटे प्रतिशत का बदलाव सीटों की संख्या में भारी बदलाव ला सकता है। सीजेपी का उदय इस तीसरे परिदृश्य को संभव बनाता है, हालांकि इसका चुनावी प्रभाव अपरिमेय है। चार महीने राजनीति में सब कुछ बदल सकते हैं। तिलचट्टे योगी सरकार को नहीं हटा सकते। लेकिन उन्होंने सीएम को चिंता करने का मौका दे दिया है।
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