अमुमन सभी समाज में सोश्यल ग्रुप बने हैं, सोश्यल ग्रुपों की स्थापना का मकसद आपसी मैत्री और सामाजिक तालमेल बडाने को ध्यान में रखकर की गई होगी परंतु धीरे-धीरे यही *सोश्यल ग्रुप सामाजिक तौर पर व्यक्तिगत अलंकार के कारण पर एक दूसरे से गुटबाजी करते हुए टूटते गए* और नित नये ग्रुप बनने लगे और सोश्यल ग्रुपों की मूल संस्था फेडरेशन भी अछुती नही रही और अलग-अलग पसंददिता अध्यक्ष के नेतृत्व में नये फेडरेशन बनते गए।
युवा पीढ़ी के सोश्यल ग्रुप में पश्चात संस्कृति प्रचुर मात्रा में छा गई और नया कुछ करने की लालसा में सामाजिक परंपरा नियम और संस्कृति से परे होकर इन सोश्यल ग्रुपों के कार्यक्रम आयोजित होने लगे इन कार्यक्रमों में कई जगह युवा पीढ़ी के सामाजिक और भारतीय परंपरा के विपरीत जाने पर कई विवाद भी खड़े होते गए।
कुल मिलाकर कई जगह *सामाजिक ग्रुपों में असामाजिकता ने अपने पैर फैला लीये है* समाज के लोगों को इस पर गहन चिंतन करना होगा और इस बढ़ती गुटबाजी को रोकना होगा अन्यथा आने वाले समय में समाज के टुकड़े होते जाएंगे या समाज बिखर जाएगा।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक पत्रकार पर्यावरणविद्)