पर्युषण के कई अर्थ अलग-अलग बताए गए हैं आत्मनिरीक्षण, आत्म साधना, विकारों का नाश यानी अपनी आत्मा के साथ रहना या यू कहो आत्मा के पास रहना। बरसों पूर्व से इस पर्व को 8 दिन और 10 दिन मनाने का चलन बना हुआ है और इस दौरान भगवान महावीर की जयंती भी मनाई जाती है और संवतसरी पर्व भी मनाया जाता है और इसी दौरान तप आराधना का दौर भी चलता है। आत्म कल्याण और चिंतन का यह उपयुक्त समय माना जाता है और इस बाबत विद्वान साधु साध्वी आचार्य हमें मार्गदर्शित करते हैं। समय की विडंबना है कि हमारा समाज बेसिकली दो धडो (दिगंबर एवं श्वेतांबर) में फल फूल रहा है और इन दो धडो के भी अंदरूनी कई धडे बन चुके हैं। यही कुछ साधु साध्वी, श्रावक, संघ प्रधान या धर्म प्रमुखो का इगो टकरा जाता होगा इसीलिए कई बार संवतसरी पर्व अलग-अलग तिथियां में मनाई जाती है और कई बार महावीर जयंती भी अलग-अलग दिनो में मनाए गये।
कटु सत्य यह है कि हमारे धर्मगुरु भगवान महावीर के संदेश पर चलते तो है लेकिन उसमे अलग-अलग विच्छेद करते हुए अपने-आपको सर्वोपरि विद्ववान मानते हुए धर्म आराधना और पर्वों के लिए अलग-अलग गाइडलाइन और तिथियां तय कर लेते हैं।
हमें क्या करना चाहिए।
इन दिनों हमें भगवान महावीर के पांच उपदेशों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य / अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य) का मनन करना चाहिए। तप और धर्म आराधना से आत्मा के साथ तन की भी शुद्धी करना चाहिए। हम अपने परिवार को धार्मिक आस्था का वास्ता देते हुए संगठित करें, साथ ही हमें समाज को भी संगठित करने में अपना समय देना चाहिए। सभी कट्टरताओं को भूलाते हुए जैन समाज में धर्म आराध्या की जितनी भी विधि स्थानो (मंदिरों और स्थानक) में सिखाई जाती है उसमें जहां तक हो सके सहयोग करें और सहभागिता दें। हम अपनी आत्मा को निर्मल पवित्र बनाने के लिए जितना हो सके प्यार मैत्री आदर करूणा का भाव रखें और फास्टिंग पर ध्यान दें फास्टिंग वैज्ञानिक तौर पर साबित हो चुकी है की स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है पर हां यह ध्यान रखें की अती हर एक चीज की बुरी होती है।
इन पवित्र दिनों में हम अपने घरों पर जैन ध्वज लगाये। घर में दीपक अगरबत्ती और धूपबत्ती लगाये इससे घर के भीतर की वायु भी शुद्ध होगी जो की स्वास्थ्यवर्धक रहेगी। सभी समग्र साधु संत का आदर रखें पर हां यदि कहीं कट्टरता है दिखे तो उसका विरोध जरूर करें हमें जैन समाज को मजबूत और उसके प्रभाव प्रभुत्व और प्रतिनिधित्व पर जोर देना है। हम बटेंगे तो कटेंगे।
जय जिनेंद्र
अशोक मेहता, (लेखक पत्रकार पर्यावरणविद्)