अच्छे व्यवहार (सदाचार) के बॉन्ड के उल्लंघन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में भोपाल जिला एवं सत्र न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल नया आपराधिक मामला दर्ज हो जाना, अपने आप में बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
न्यायाधीश नीलम शुक्ला की अदालत ने डीसीपी जोन-1 द्वारा जारी जेल भेजने के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने से पहले ठोस साक्ष्य, निष्पक्ष जांच और गवाहों के बयान आवश्यक हैं
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पुलिस ने यह साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र जांच नहीं की कि सौरभ ने वास्तव में बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है। अदालत ने कहा कि केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर किसी को जेल भेजना न्यायसंगत नहीं है। ऐसे मामलों में स्वतंत्र साक्ष्य, गवाहों के बयान और निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।
रिकॉर्ड के अनुसार, हबीबगंज निवासी हर्षित ने शिकायत दर्ज कराई थी कि वह अपने दोस्त के साथ 10 नंबर मार्केट के पास शिव बारात में शामिल होने गया था। इसी दौरान धक्का लगने से सौरभ वर्मा से विवाद हो गया। आरोप है कि सौरभ और उसके साथियों ने हर्षित के साथ मारपीट की। हालांकि अदालत ने माना कि इस घटना के आधार पर बॉन्ड उल्लंघन मानने से पहले आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।