मध्य प्रदेश में कृषि विभाग के बाद अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विभाग में भी ऐसे मामले सामने आए हैं। एमएसएमई में निचले स्तर के कई प्रभारी प्रबंधकों को सीधा जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्रों का महाप्रबंधक (जीएम) बना दिया गया है। यह फैसला तब लिया गया है जब विभाग के पास एमपीपीएससी द्वारा चयनित 2016, 2017 और 2019 बैच के 60 से अधिक योग्य वर्ग-2 (राजपत्रित) अधिकारी पहले से मौजूद हैं।
वाणिज्यिक कर विभाग और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में स्थानांतरण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन देखने को मिला है। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में कई स्थानों पर एक ही पद के लिए दो-दो अधिकारियों की पोस्टिंग कर दी गई है, जिससे भारी असमंजस की स्थिति है। इंदौर में पदस्थ चीफ इंजीनियर योगेंद्र कुमार को उनके मूल पद से सीधे दो स्तर ऊपर का प्रभार दे दिया गया, जिस पर अन्य अधिकारियों ने वरिष्ठता क्रम के उल्लंघन की कड़ी आपत्ति जताई है।
ग्रामीण विकास विभाग में 40 से अधिक योग्य अधिकारी उपलब्ध होने के बावजूद लगभग 33% पदों को नियम विरुद्ध तरीके से भरा गया था। हालांकि, कड़े विरोध के बाद विभाग ने अपनी गलतियों में सुधार किया है। इंदौर संभाग में अतिरिक्त संचालक स्तर के अधिकारी दीतू सिंह राणदा को उनके मूल पद से नीचे 'संयुक्त आयुक्त' के पद पर रखा गया था। वहीं भोपाल में, जनपद स्तर के सीईओ विनोद यादव को पदोन्नत कर 'संयुक्त आयुक्त' का प्रभार दे दिया गया था।
प्रशासनिक विशेषज्ञों और अधिकारियों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया मप्र सिविल सेवा नियम, 1961 के खिलाफ है। नियमों के अनुसार, प्रशासनिक व्यवस्था पदानुक्रम के सिद्धांत पर काम करती है। कोई भी कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारी कभी भी अपने वरिष्ठ (सीनियर) का 'नियंत्रण प्राधिकारी' नहीं हो सकता।
किसी जूनियर को उच्च पद का प्रभार देकर उसे अपने सीनियर की वार्षिक सीआर लिखने का अधिकार देना 'सर्विस ज्यूरिसप्रूडेंस' के मूल सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है।