दिवाली पर रोशनी देखने और खुशियां मनाने की उम्र में ऋतिक, सत्येंद्र और कार्तिक के सामने सवाल है कि क्या वे फिर कभी पहले की तरह देख पाएंगे?
पिछले साल दिवाली पर कार्बाइड गन चलाने से तीनों की जिंदगी बदल गई। किसी की एक आंख की रोशनी चली गई, तो किसी की आंख गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
परिवारों ने कर्ज लेकर इलाज पर लाखों रुपए खर्च किए, लेकिन आंखों की रोशनी नहीं लौटी। ऋतिक और कार्तिक को चेन्नई में इलाज कराने की सलाह मिली है। वहीं, कार्तिक के पिता के पास भोपाल आने तक के पैसे नहीं हैं।
इस बीच, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस दिवाली पर कार्बाइड गन और लैंप पर रोक लगाने, अवैध पटाखों की बिक्री रोकने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।
तीन बच्चों की कहानी, जिनकी आंखों पर असर
1. ऋतिक की आंख की रोशनी गई, पिता कर्जदार
शमशाबाद के धोबीखेड़ा गांव के ऋतिक अहिरवार की एक आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई है। दूसरी आंख से भी उन्हें कम दिखाई देता है।
पिता जसवंत सिंह के मुताबिक, दिवाली पर एक बच्चा बारूद वाली कार्बाइड गन चला रहा था। इसी दौरान गन की दिशा ऋतिक की आंख की तरफ हो गई और विस्फोट से उन्हें गंभीर चोट आई।
इलाज में अब तक करीब ढाई लाख रुपए खर्च
परिवार ऋतिक को इलाज के लिए भोपाल के एम्स, आनंदपुर और चित्रकूट ले गया। अब डॉक्टरों ने चेन्नई में इलाज कराने की सलाह दी है। परिवार इलाज पर अब तक करीब ढाई लाख रुपए खर्च कर चुका है।
मजदूरी करने वाले जसवंत सिंह पर करीब एक लाख रुपए का कर्ज है। आगे के इलाज पर दो से तीन लाख रुपए और खर्च होने की आशंका है। तीन बेटों में दूसरे नंबर के ऋतिक के पिता के लिए इतनी रकम जुटाना मुश्किल है।
ऋतिक ने सरकार से इलाज में मदद की अपील की है। गांव के लोगों ने भी मुख्यमंत्री से बेहतर इलाज की मांग की है। ऋतिक दूसरे बच्चों को भी बारूद वाली कुंडी और खतरनाक गन नहीं चलाने की सलाह देता है।
2. कार्बाइड गन से चोट के बाद सत्येंद्र की पढ़ाई छूटी
भिंड जिले की गोहद तहसील के कमलापुर गांव के 17 वर्षीय सत्येंद्र सिंह गुर्जर भी पिछले साल दिवाली पर हादसे का शिकार हुए थे। उन्होंने घर में पानी की बोतल से कार्बाइड गन बनाई थी। कैल्शियम कार्बाइड डालकर चलाने के दौरान धमाका हुआ और उसके कण उनकी आंख में जा लगे।
परिजन उन्हें पहले ग्वालियर के निजी अस्पताल और फिर भोपाल एम्स ले गए। कई महीने इलाज चला, लेकिन उनकी एक आंख की रोशनी करीब 90% प्रभावित हो गई। वह आज भी उस आंख से नहीं देख पाते।
चोट और लंबे इलाज के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई। अब सत्येंद्र अपने अनुभव से दूसरों को जागरूक कर रहे हैं। वह लोगों से दिवाली पर सुरक्षा का ध्यान रखने और बच्चों को कार्बाइड गन जैसे देसी विस्फोटक उपकरणों से दूर रखने की अपील करते हैं।
3. यूट्यूब पर वीडियो देख बनाई गन, कार्तिक की आंख में चोट
एक साल बाद भी वापस नहीं लौटी है। उनके पिता मुकेश कुशवाह मजदूरी करते हैं। उनके दो बेटे हैं।
मुकेश के मुताबिक, कार्तिक ने यूट्यूब पर कार्बाइड गन बनाने के वीडियो देखे थे। वह बाजार से कार्बाइड लाया और खाली डिब्बे से गन बनाकर चलाने लगा। शाम को उसने डिब्बे की जगह प्लास्टिक की बोतल रख दी।
धुआं नहीं निकला, तो वह झुककर देखने लगा। इसी दौरान धमाका हुआ और उसकी आंख में गंभीर चोट आई। रात करीब 11 बजे परिवार उसे निजी अस्पताल ले गया। शुरुआती इलाज के बाद दिवाली पर उसे भोपाल एम्स में भर्ती कराया गया।
डॉक्टरों ने चेन्नई में इलाज कराने की सलाह दी है। मुकेश के मुताबिक, वहां एक अन्य बच्चे के इलाज पर करीब 1.20 लाख रुपए खर्च हुए थे। कार्तिक के इलाज पर भी इतनी या इससे ज्यादा रकम लग सकती है।
मजदूरी से घर चलाने वाले मुकेश के लिए भोपाल आने का खर्च जुटाना ही मुश्किल है। ऐसे में चेन्नई में इलाज कराना उनके लिए बड़ी चुनौती है।
अब जानिए प्रशासन और सरकार ने क्या कदम उठाए?
एम्स की सलाह: आंख में चोट लगे तो तुरंत अस्पताल जाएं
भोपाल एम्स ने दिवाली पर कार्बाइड गन और देसी विस्फोटक उपकरणों से दूर रहने की सलाह दी है। इनके विस्फोट से आंख, चेहरा, हाथ और कान में गंभीर चोट लग सकती है।
जलने और स्थायी शारीरिक अक्षमता का खतरा भी रहता है। एम्स ने अभिभावकों से बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखने की अपील की है।
एम्स के मुताबिक, आंख में चोट लगने पर उसे रगड़ें नहीं और बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न डालें। तुरंत नेत्र विशेषज्ञ या अस्पताल पहुंचें।
जलने पर प्रभावित जगह को साफ बहते पानी से करीब 20 मिनट तक ठंडा करें। बेहोशी, अत्यधिक रक्तस्राव, सांस लेने में परेशानी या गंभीर चोट की स्थिति में तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
मुख्यमंत्री ने कार्बाइड गन पर रोक लगाने के निर्देश दिए
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुधवार को मंत्रालय में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए कलेक्टरों, कमिश्नरों, एसपी और आईजी को कानून-व्यवस्था के लिए पहले से तैयारी करने को कहा।
उन्होंने अवैध पटाखों और कार्बाइड गन की बिक्री रोकने, विस्फोटक सामग्री के भंडारण पर कार्रवाई करने, संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाने और सार्वजनिक स्थानों पर गश्त करने के निर्देश दिए।
रोक के बावजूद ऑनलाइन उपलब्ध हैं कार्बाइड गन
ऑनलाइन वीडियो और ई-कॉमर्स साइट पर बिक्री
कार्बाइड गन के खतरों के बावजूद इंटरनेट पर इन्हें बनाने के वीडियो उपलब्ध हैं। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी इन उपकरणों की बिक्री की जानकारी सामने आई है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पिछले साल मध्यप्रदेश में कार्बाइड गन से आंखों को नुकसान पहुंचने के करीब 300 मामले सामने आए थे।
लेख में दी गई जानकारी के अनुसार, कार्बाइड गन को आर्म्स एक्ट की श्रेणी में शामिल किया गया है और इसकी खरीद-बिक्री पर कार्रवाई हो सकती है।
भास्कर ने किया रियलिटी चेक
दैनिक भास्कर ने एक ई-कॉमर्स साइट से कार्बाइड पाइप गन बुक करके रियलिटी चेक किया। साइट पर इसे बंदर भगाने वाले उपकरण यानी ‘PVC Monkey Repeller Gun’ के नाम से बेचा जा रहा था।
अमेजन, फ्लिपकार्ट और ई-बे जैसे प्लेटफॉर्म पर इसकी कीमत ढाई हजार रुपए तक बताई गई। डिलीवरी के लिए पांच से सात दिन का समय दिए जाने का दावा था। इससे ऑनलाइन बिक्री पर रोक के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते हैं।