'रूस अगर चीन के करीब गया तो भारत को खराब लगेगा', रूसी मीडिया ने दी 'धमकी', निशाने पर फ्रांस-अमेरिका
Updated on
23-09-2026 11:45 AM
मॉस्को: रूसी तेल खरीदने को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के 100 फीसदी टैरिफ को लेकर रूसी मीडिया ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और पश्चिमी देश 'भारत-रूस की दोस्ती तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।' रूस के मशहूर न्यूज आउटलेट 'इजवेस्टिया' ने कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप रूसी तेल खरीदने के लिए भारत को सजा देने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने 100 फीसदी टैरिफ लगाने वाले बिल पर दस्तखत कर दिए हैं। जिससे बचने के लिए भारत रूसी तेल के आयात को कम करने के लिए मजबूर हो सकता है।
'इजवेस्टिया' ने लिखा है कि पिछले महीने भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत थी। ट्रंप ने हाल ही में एक बिल पर साइन करके उसे कानून बना दिया है जिससे उन्हें रूस के बड़े एनर्जी पार्टनर देशों को सजा देने का अधिकार मिल गया है। इस कानून के तहत अमेरिका 100% तक टैरिफ लगा सकता है जिससे बचने के लिए भारत आयात कम कर सकता है।इसने लिखा है कि हालांकि सितंबर में ही भारत के एक बड़े राजनयिक ने संकेत दिया है कि रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका के किसी भी नए दबाव को भारत नहीं मानेगा क्योंकि इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जरूरी माना जाता है। लेकिन भारत पर प्रेशर और ज्यादा बढ़ाने की कोशिश की जाएगी और ऐसा सिर्फ अमेरिका के टैरिफ से ही नहीं बल्कि कई और बातों से पता चलता है।
'रूस से दोस्ती तोड़ने के लिए भारत पर प्रेशर बना रहा पश्चिम'
रूसी अखबार 'इजवेस्टिया' ने लिखा है कि इस हफ्ते शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात होने वाली है। इस दौरान ट्रंप, शी जिनपिंग से व्यापार युद्ध को कम करने के लिए बात करने वाले हैं। इस दौरान दोनों नेता अपने व्यापार युद्ध में युद्धविराम को कितने समय के लिए बढ़ाया जा सकता है इसपर बात करेंगे। अगर ऐसी किसी समय-सीमा को बढ़ाने पर सहमति बन जाती है तो उम्मीद है कि अमेरिका चीन पर रूसी तेल खरीदने के लिए सजा के तौर पर टैरिफ नहीं लगाएगा जिससे भारत के मामले पर भी ध्यान जा सकता है।रूसी अखबार ने आगे लिखा है कि हालांकि अमेरिका को भारत की रूस और अमेरिका के बीच संतुलन बनाने की नीति से फायदा होता है क्योंकि भारत को मिलने वाले रणनीतिक फायदे उसे चीन के खिलाफ एक तरह से मजबूत बनाते हैं और चीन को संतुलित करने में मदद करते हैं फिर भी 'ट्रंप 2.0' में अमेरिका 'भू-राजनीतिक रूप से लालची' हो गया है और वो चाह सकता है कि अमेरिका भारत का 'सीनियर पार्टनर' यानि मुख्य सहयोगी बने।
ऐसी स्थिति में रूसी तेल आयात पर सजा वाले टैरिफ का डर एक 'डैमोकल्स की तलवार' (सिर पर लटकी हुई बड़ी मुसीबत-एक प्राचीन यूनानी कहानी) की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मकसद भारत पर दबाव डालना हो सकता है ताकि वह धीरे-धीरे रूसी तेल का आयात कम करे और साथ ही पश्चिम के 'होर्मुज गठबंधन' में शामिल हो जाए।
रूसी मीडिया क्या भारत को चेतावनी दे रहा?
रूसी अखबार ने फ्रांस के विदेश मंत्री के उस बयान का जिक्र किया है जिसे उन्होंने न्यूयॉर्क में UNGA सम्मेलन से इतर दिया है। इसमें उन्होंने 'होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य में नेविगेशन की स्वतंत्रता' पर भारत के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई है। इसने लिखा है कि यह घटनाक्रम तब हुआ जब ट्रंप के साथ बातचीत के बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के ट्वीट के मुताबिक फ्रांस और अमेरिका के राष्ट्रपति होर्मुज मामले पर काम करने के लिए सहमत हुए। पश्चिमी देशों के होर्मुज गठबंधन में भारत की संभावित भागीदारी भले ही वह टैरिफ के दबाव में हो महत्वपूर्ण होगी।इसने लिखा है कि अगर टैरिफ का इस्तेमाल अमेरिका कामयाबी के साथ करता है और भारत पश्चिमी गुट में शामिल होता है तो रूस को चीन के साथ अपने संबंध और मजबूत करने पड़ेंगे जिससे भारत के साथ रिश्ता खराब होगा। लेकिन अब फ्रांस भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार साझेदार है इसलिए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगर टैरिफ की धमकी सफल होती है तो अमेरिका इस रुझान को तेज करने के लिए भारत के खिलाफ और ज्यादा CAATSA प्रतिबंधों की धमकी दे सकता है। इस तरह से पश्चिमी देशों के होर्मुज गठबंधन में भारत की भागीदारी रूस के साथ उसके भविष्य के संबंधों के लिए हानिकारक हो सकती है।
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