जीत के बाद क्या?
उस समय बोधना ने कहा था, ‘मुझे शतरंज के मोहरे बहुत आकर्षक लगे, इसलिए मैंने खेलना शुरू कर दिया।’ इसके बाद से उत्तर-पश्चिम लंदन की इस स्कूली छात्रा ने लगातार कई रिकॉर्ड तोड़े हैं और सबसे कम उम्र की सफल खिलाड़ियों में अपनी पहचान बनाई है।शतरंज के तेज फॉर्मेट में वह पहले ही ‘यूके ओपन महिला ब्लिट्ज’ चैंपियन और संयुक्त ब्रिटिश महिला रैपिड चैंपियन बन चुकी हैं। अब क्लासिकल प्रारूप की इस जीत के साथ 11 वर्षीय बोधना ने शानदार हैट्रिक पूरी कर ली है। इस चैंपियनशिप में उनकी एकमात्र हार छठे दौर में श्रेयस रॉयल के खिलाफ हुई।
वहीं श्रेयस रॉयल ने नौ दौर के बाद तालिका में टॉप स्थान हासिल कर कुल अंक से ब्रिटिश खिताब अपने नाम किया। उन्होंने इंग्लैंड के अनुभवी ग्रैंडमास्टर्स को आधे अंक से पीछे छोड़ दिया। अपने पहले ब्रिटिश खिताब के साथ उन्होंने विश्व स्तरीय उभरती हुई शतरंज प्रतिभा के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर ली है।
इंग्लैंड के सबसे कम उम्र के ग्रैंडमास्टर बनने के बाद श्रेयस ने कहा था, ‘चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, लगातार प्रयास करते रहिए।’ दक्षिण-पूर्व लंदन के इस किशोर खिलाड़ी ने आगे चलकर ब्रिटेन के प्रमुख युवा शतरंज खिलाड़ियों में अपना स्थान बनाया।









